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दिल ये ज़िद्दी है....

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  " ज़िद्दी " कितना नकारात्मक शब्द माना जाता है ना। बचपन से हम सुनते आए हैं कि ज़िद मत करो, ज़िद्दी होना बुरी बात है। एक तरह से ये बात सही है कि लेकिन वाक्य अधूरा है सही वाक्य यह होगा कि " बेवजह की ज़िद बुरी बात है।" मतलब हर ज़िद बुरी नहीं होती।  "ज़िद करो दुनिया बदलो" यह वाक्य याद होगा तो शायद आपको मेरे कहने का तात्पर्य जल्दी समझ आएगा। खैर न भी याद हो तो कोई बात नहीं।     आपको ज़िद को समझना होगा ज़िद आखिर होती क्या है ? अपनी मांग को लेकर दृढ़ रहना ही तो ज़िद है।  जब तक मांग पूरी नहीं हो जाए बात पर अड़े रहना, चाहे कुछ हो जाए, चाहिए मतलब चाहिए ही, इस तरह की भावना ही ज़िद है। जिसमें हम कह सकते हैं कि मांग की पूर्ति के अलावा कोई रास्ता नही होता कोई चीज़ बीच मे नहीं आ सकती कोई समझौता नहीं हो सकता।     तो क्या हो अगर आप इस तरह की ज़िद किसी अच्छी आदत या अच्छी बात के लिए करें और खुद से इस तरह की ज़िद करें। मसलन, आपकी ज़िद हो स्वास्थ्य को लेकर कसरत करने की, किसी नई भाषा (जैसे अंग्रेज़ी) सीखने की, इसी तरह किसी लक्ष्य की प्राप्ति को लेकर आपकी ज़िद हो ।  ...

कुछ कठोर सवाल...

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हम आज एक समस्या पर कुछ सवाल दागेंगें लेकिन उसके लिए पहले समस्या का ज़िक्र जरूरी है। ये समस्या वो है जिसका नाम लेने में भी हमें शर्म महसूस होती है "बलात्कार"! तो, कोई ऐसा कर कैसे सकता है समझ से परे है।   इस समस्या के लिए दोषियों से ज्यादा लड़की की लापरवाही, उसके अकेले निकलने, यहाँ तक कि उसके पहनावे हर बात को कोसना खत्म हो गया हो तो आगे बात करते हैं।   हम यहाँ समस्या के एक पहलू को ही उठाएंगे ताकि एक ही बात का विश्लेषण अच्छे से कर सकें। इसलिए हम समस्या के अन्य कारणों का ज़िक्र यहाँ नहीं कर रहे हैं लेकिन जो कारण यहाँ लिया जा रहा है वो भी अपने आप मे कम नहीं है, बशर्ते आप ईमानदारी से मंथन करें।  हाँ, तो क्या कोई इंसान सच में दरिंदों की तरह व्यवहार कर सकता है ? क्या उनके दिल में ज़रा भी रहम नहीं आता ऐसा कुकृत्य करते वक्त ?  अपने आस-पास घर में, चौराहे पर, सड़कों पर, बाज़ारों में,लोगो की अच्छी-बुरी हर तरह की नागाहों से सामना हुआ है मेरा,और यकीनन हर लड़की का हुआ होगा।   इनमें से बुरी निगाहों की तीव्रता में अंतर समझ आता है । लेकिन इनमें से ज्यादा...

आप कब खुश होते हैं ?

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आपसे कोई पूछे कि आप क्या देखकर या क्या पाकर खुश होगें या की क्या चीज आपको खुश कर सकती है ? आपका जवाब क्या होगा नौकरी, शादी, पैसा, घर आदि-आदि शायद अधिकांश का जवाब कुछ इसी तरह का होगा। अब वो मिलने के बाद भी आप खुश होतें हैं या नही,आज मुद्दा वो नहीं है।   दरअसल आज मुद्दा है कि आप इतना इंतज़ार क्यों करेंगे खुश होने का, मतलब ज़ाहिर है कि ये सारी चीजें प्राप्त करने में समय लगता है तो तब तक क्या ? मेरा तात्पर्य यह है कि आप अपने आस पास की बहुत सी छोटी-छोटी चीजों से भी खुश हो सकते हैं और फिर खुशी-खुशी कीजियेगा कोशिश अपनी अपेक्षाकृत बड़ी खुशियां पाने का। अपनी पसंद की चीजों की सूची बनाइए और कोशिश कीजिये इस सूची में शामिल चीजें जितनी हो सके उतनी छोटी व आसान हो। अपनी पसंद की चीजें शामिल करने का मकसद है कि उनसे आपके चेहरे पर मुस्कान आती है या आपको खुशी मिलती है। वैसे ही जैसे मान लो आपको गुलाब पसन्द हों और कोई आपके लिए गुलाब का बुके ले आये आपकी प्रतिक्रिया कैसी होगी ? दिल खुश और नतीज़तन एक प्यारी सी मुस्कान जो वास्तविक(नेचुरल) होगी । ये सूची बनाने से होगा यह कि आपको समझ आएगा कि ऐसी बहु...

अनसुलझी पहेली और आदर्शवादी जवाब..

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शीर्षक की तरह ही है आज का मुद्दा कुछ अनसुलझा सा। क्या आप लोगो के दिमाग मे कभी ये ख़याल आया है कि हमारे आस पास के कुछ लोग ऐसे क्यूँ हैं ? ऐसे मतलब जो इंसानियत से पहले किसी और चीज़ को तवज्जो देते हैं जैसे धन, ओहदा आदि।    इन लोगो की समझदारी पर आश्चर्य होता है कि कैसे - कैसे तरीकों को अपनाते हैं ये लोग अपने फायदे के लिए। लेकिन मुझे समझ नही आता कि ये आखिरकार इनके लिए फायदेमंद होता भी है या नहीं।   ये लोग तात्कालिक फायदे को ही हमेशा नज़र में कैसे रख सकते हैं। क्या गलत तरीके से कमाया गया पैसा या फायदा उनकी आने वाली पीढ़ी को आरामपसंद औऱ कामचोर बनाने की राह पर नहीं ले जाता। वो क्या उसूल पेश करते होंगे अपने बच्चों के आगे, क्या ये ही बच्चे भविष्य में पैसे के आगे अपने बूढ़े माता पिता को तवज्जो देंगें।   मेरा ख़याल है अपने जीवन मे हमे कम से कम कुछ अच्छे कर्म तो करने ही चाहिए जिनकी मिसालें आने वाली पीढ़ियों को दी जा सके। अपने बच्चों के लिए कुछ अच्छे और सच्चे किस्से सहेजिये।   साथ ही कुछ लोग इन तथाकथित समझदारों से बिल्कुल उलट होते हैं जिन्हें नफा- नुकसान ज्यादा समझ नही...

अपनी भूमिका खुद चुनें

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  आज शुरुआत एक कहानी से करते हैं या कहें कि आज सिर्फ कहानी...।   एक व्यक्ति जंगल से गुज़रता है तभी उसे एक लोमड़ी दिखाई देती है जो पूरी तरह अपाहिज और लाचार नज़र आती है। वह सोचता है की ये लोमड़ी जीवित कैसे होगी ? वो वहीं रुक कर देखता है। कुछ समय बाद वो देखता हैं कि एक शेर अपने शिकार से साथ आता है और शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के लिए छोड़कर चला जाता है। वह आश्चर्यचकित रह जाता है कि शेर लोमड़ी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाता साथ ही उसे भोजन भी उपलब्ध कराता है। इसके बाद वह जंगल में ही रहने का मन बना लेता है और सोचता है कि भगवान जैसे इस लोमड़ी के लिए भोजन का इंतज़ाम करतें हैं उसी प्रकार मेरे लिए भी करेंगें। मेरे जीवन की व्यवस्था भगवान जरूर करेंगें।   इसके बाद वो इंतज़ार करता रहता है और दिन बीतते जातें हैं। दो दिन तक कोई नहीं आता अब वो एकदम कमज़ोर हो जाता है फिर भी सोचता है भगवान अवश्य कुछ करेंगे। अगले दिन एक संत जंगल से गुजरते हैं और उस व्यक्ति पर उनकी नज़र पड़ती है। संत उसके पास जाकर उससे सब माज़रा पूछते हैं। संत मुस्कुराते हैं और कहतें हैं कि भगवान ने तुम्हे ग्राही नहीं दाता की भूम...

अच्छाई पर भरोसा और उसकी कद्र...आप करतें है ?

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वैसे आपका जवाब क्या है ? "हाँ ", ज़रा ठीक से सोचिए यकीनन "हाँ " । अच्छा चलिए आपकी बात मान लेते हैं, वैसे आज यही(मानना) विषय भी है जो आप आगे समझ जाएंगे।        क्या आपने कभी महसूस किया है कि ये व्यक्ति(मतलब सामने वाला व्यक्ति) अच्छे होने का अभिनय कर रहा है, या शायद इसका मन्तव्य कुछ और है भले ही वो मंतव्य आपके समझ न आ रहा हो। मेरा ख़याल है कभी-न-कभी आपको जरूर ऐसा महसूस हुआ होगा। ऐसा दरअसल होता क्यों है ? क्योंकि हम कई बार ऐसे मीठे बोलने वाले लोगों के झांसे में आकर धोका खाये हुए होतें हैं या इस तरह के किस्सों से वाकिफ़ होते हैं जिनमे विलन मीठी छुरी की तरह होते हैं।   तो, ये बातें हम कर क्यों रहे हैं ? क्या आपको नहीं लगता कि आपकी इस तरह की मानसिकता( ऊपर वर्णित) अच्छाई से भरोसा उठता हुआ दर्शा रही है। इससे सिध्द होता है कि कहीं-न-कहीं आप ये मानते हैं कि कोई इतना अच्छा कैसे हो सकता है ? इसकी निःस्वार्थ मदद के पीछे भी शायद कोई स्वार्थ छिपा है।           मेरा ये कहना है कि हो सकता है कि कुछ लोग वाकई में ...

मेहनत का घड़ा

  देखिये इसकी भूमिका में पिछले ब्लॉग में दे चुकी हूँ, तो उसे भी ध्यान में रखिएगा। आपकी ज़िंदगी मे कितनी समस्याएँ हैं ना परिवार, नौकरी, रिश्ते, असफलताएं आदि आदि अनिश्चितता से ...

छात्र जीवन मे हीरोपंती...

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   कभी-कभी हमें महसूस होता है कि ज़िन्दगी में सारी समस्याएं एक साथ टूट पड़ी हैं और खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। लगता है जैसे सब कुछ करते हुए भी हम कुछ नही कर पा रहे और पता नही क्यूँ इन असफलताओं के स्वयं के बोझ के साथ-साथ अपेक्षाओं का बोझ बढ़ता जा रहा है।   तब लगता है जैसे परिवार को समझ क्यों नही आता कि उनसे ज्यादा हम पर बीतती है दिन-रात मेहनत के बाद असफल होने में भला किसे मज़ा आता होगा? क्या हम तैयारी करने वालों से ज्यादा हमे तैयारी करते देखने वाले ज्यादा थक गए हैं? तो फिर कैसे वो अपना ज्ञान झाड़ कर हमारी ज़िंदगी पर सवाल दाग गायब हो जाते हैं। तो क्या कर सकते हैं हम ऐसी परिस्थिति में ? जवाब सवाल जितना ही जटिल है। हमे सारी चीजों को गौर से देखना चाहिए और इन सब से परे हटकर निरीक्षण करना चाहिए कि आखिर हो क्या रहा है ? किसी फिल्म जैसा नहीं लग रहा ?   दरअसल जब आप सफलता के बहुत क़रीब होते हो तो समस्यायों की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ जाती है। एक महिला तैराक जो इंग्लिश चैनल पार कर रही थी किनारे से सिर्फ कुछ मीटर दूरी पर हार मान गई यदि वो एक बार ओर दम भर लेती तो रिकॉर्ड ...

कुछ तो लोग कहेंगे....

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आज के जमाने में फटी जीन्स स्टाइल स्टेटमेंट है लेकिन कुछ सालों पहले ऐसा करने पर लोग कितनी बातें बनाते थे। वैसे आप कहेंगे कि बनाने वाले आज भी बाते बना ही लेते हैं और आप सही भी कह रहे हैं लेकिन मुख्य बात यह है कि क्या आज उनकी बातें बनाने का जीन्स पहनने वाले पर फर्क पड़ता है ?   बेशक नहीं बल्कि फटी जीन्स पहनकर उनका स्वैगर और बढ़ जाता है। मतलब आजकल का फैशन या आजकल की पीढ़ी "बेफिक्रे" है। ज्यादा मत सोचिए, मैने ये फ़िल्म(बेफिक्रे) नहीं देखी है तो यहाँ संदर्भ अलग है।   तो आज के इस अचानक शुरू होने वाले ब्लॉग के इंट्रो से आपको क्या समझ आया..? ये बताता है कि सही लिहाज़ में बेफिक्रे बनने में कोई बुराई नही है। मतलब आपको लोगो या उनकी बातों की बजाए अपने हिसाब से काम करना चाहिए । इससे फायदा यह होगा कि आप कम से कम एक इंसान को तो खुश रख पाएंगे और वो ख़ुद आप है, इसी के साथ आपकी खुशी से आपके अपने भी खुश होंगे। वह काम भी अच्छे से होगा फलतः लोग भी कहीं न कहीं खुश होंगे। और अगर आप लोगो को खुश करने जाओगे तो वो असम्भव किस्म की बात है जिसमे आपको अपना मन मारना पड़ेगा मतलब आप खुश नहीं, और बिना ...

पुरानी बात...लेकिन , हर थोड़े दिन में पढ़ने लायक

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आज में अपनी कुछ पुरानी बातों को मतलब पहले लिखीं गई बातों को आपके साथ साझा करना चाहूँगी। ऐसा इसलिए क्योंकि पुरानी होकर भी ये बातें कभी पुरानी नही होती और हमेशा प्रासंगिक बनी रहती है।    आप इसे मेरे जीवन का फलसफा(फिलोसोफी) समझ सकते हैं जिसे में स्वयं भी मन अशांत होने पर दोहराती रहती हूँ। ये बातें आपको फिर से आपके मूल स्वरूप में लाने में मदद करती है और विज्ञान का नियम है कि कोई भी वस्तु ज्याददेर तक अपने मूल स्वरूप से अलग नहीं रह सकती।  तो, ये ब्लॉग भी अपने मूल स्वरूप में ही मैं प्रस्तुत कर रही हूँ शायद आपको थोड़ा लम्बा लगे लेकिन उम्मीद है रसपूर्ण लगेगा तो लम्बाई आप भूल जाओगे। और यदि फ़ोटो के स्वरूप में पढ़ने में मुश्किलात आये तो मुझे इत्तिला करें।

ज़िंदगी में गाने या गानों में ज़िंदगी...

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वैसे शीर्षक अपनी कहानी आप बयाँ करने में सक्षम है, इसलिए चलिए सीधे आगे बढ़ते हैं। मैंने आजतक किसी इंसान को नहीं देखा जो गानों से सरोकार ना रखता हो। आजकल के युवाओं की बात करने की तो जरूरत ही नहीं और इनके आगे और पीछे की पीढ़ी भी बिना अपवाद संगीत(गाने) से जुड़ी हुई है लेकिन यदि आप और पुरानी पीढ़ी को देखेंगे तो वे भी पुराने गीत या भजन जानते ही होंगे।   तो, यह सब बातें किस ओर इशारा करती है? ये बताती है कि ज़िन्दगी के हर पड़ाव या पल में संगीत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर मौजूद रहता है। आप चाहे कहीं भी हों किसी भी मूड में हों संगीत के विशाल सागर में आपको उस हिसाब का मोती मिल ही जायेगा। संगीत न सिर्फ आपको सुकून, शांति व मनोरंजन देता है बल्कि वह आपका साथ भी देता है। हर एक भाव मे गाने आपका साथ दे सकते हैं एक दोस्त की तरह।   मेरे हिसाब से सबसे कठिन समय अर्थात मुश्किल दौर में इनका महत्व सबसे ज्यादा समझ आता है । तो, संगीत का गुणगान यहीं खत्म कर मैं कुछ गानों की सूची देना चाहती हूँ जिसकी जरूरत आजकल की ज़िन्दगी में सभी को पड़ती है। इस सूची में क्रम का महत्व नहीं है लेकिन हाँ, पहला गाना वास्...

फिलोसॉफी झाड़ना....

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फिलोसॉफी झाड़ना, शिर्षक थोड़ा ज्यादा देसी हो गया नई। दरअसल इसी शब्द से मेरी बात स्पष्ट हो पाएगी। हमारे समाज मे प्रचलन है अपनी-अपनी फिलोसॉफी(दर्शन) झाड़ने का जो एक अच्छी बात भी है। क्योंकि विचार फैलाने, चर्चा करने में भला क्या बुराई| दरअसल बुराई तब आती है जब लोग अपनी फिलोसॉफी दूसरों पर थोपने लगते हैं और अपनी फिलोसॉफी को सही व सामने वालों की फिलोसॉफी को गलत सिद्ध करने पर तुल जाते हैं।    चलिए अब मुद्दे पर आगे बढ़ते हैं। मैं खुद भी यहाँ फिलोसॉफी ही झाड़ने वाली हूँ। मुद्दे की बात यह है कि हर फिलोसॉफी का मूल उद्देश्य होता है खुशी । मतलब कोई भी फिलोसॉफी अपनाओ, आप खुश हो तो यह फिलोसॉफी आपके लिये सही; अब यह जरूरी नहीं कि ये दूसरों के लिए भी सही हो ।   मान लो आपको पसंद है आज के लिए ही जीना मतलब बचत नहीं करना और हर पल का मज़ा लेना । इस तरह जीना की कल हो न हो..जो खाना है जी भर कर खाओ, जो करना है अभी ही कर लो । उम्मीद है इतने से आप समझ गए होंगे मेरा भाव, और शायद यह भी की मेरी फिलोसोफी भी यही है। हाँ, कुछ हद तक आपका अनुमान सही भी है।    तो चलो दूसरे किस्म के लोगो की बात करत...

छोटी सी बात

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आज में आप लोगो से छोटी सी बात साझा करने जा रही हूँ। वैसे कहतें हैं कि नेकी कर दरिया में डाल लेकिन मैं आप लोगो को बता रही हूँ इसलिए क्योंकि शायद ये आपको थोड़ा प्रेरित कर दे।    ख़ैर इन भारी भरकम वाक्यों से आप यह मत सोचने लगना की मैंने कुछ बड़ा किया है कृपया शीर्षक ध्यान में रखें।    मैं पिछले कुछ सालों से अपने घर के लिए मिट्टी के गणेश जी बना रही हूँ । पिछले साल एक और परिचित के लिए भी मतलब दो प्रतिमाएं मैंने बनाईं थीं। इस साल मैंने चार प्रतिमाएं बनाई अन्य लोगो के लिए भी ।    है ना छोटी सी बात लेकिन कहने का मर्म यह है कि प्रकृति को बचाने के लिए एक छोटी सी पहल । मैंने कुछ बड़ा न सही मेरे स्तर पर कुछ तो किया किसी और के लिए नही अपने लिए किया, अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए किया। और ऐसी ही छोटी चीजे में करती रहती हूँ मसलन कभी वाहन, सड़क आदि सार्वजानिक स्थलों पर कचरा नही फेंकती , गीला कचरा सूखा कचरा पृथक    रखती हूँ, निजी की बजाए सार्वजानिक वाहन का उपयोग करने की कोशिश करती हूँ आदि।    सूची देने के बाद भी कहूँगी की सूची नही देना चाह रही। ये चाह...

छोटी-छोटी खुशियाँ

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एक शाम  हल्की बारिश हो रही थी की तभी अचानक बिजली चली गई। घर में मैं , मम्मी मेरे बड़े भैया और ममेरी बहन थे। हमारे मोबाइल और पावर बैंक सभी मे चार्ज़िंग कम थी और बारिश के चलते बिजली ...

हिसाब से चलना.....

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हमें अक्सर शिकायत रहती है कि फलां इंसान हमारे हिसाब से नही चलता और यहाँ तक कि हम गहराई से सोचेंगे तो कोई भी हमारे हिसाब से नही चलता। मैं स्पष्ट करना चाहूँगी की यहाँ हम से तात...

लापरवाह की जगह बेपरवाह बनिए

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इस बार का जो विषय है वह मैने अख़बार में पढ़ा है । तो जिनका विचार है उन्हें धन्यवाद देते हुए और क्षमा मांगते हुए मैं इसे अपने ढंग से पेश करना चाहूँगी।   मेरे अनुमान से आप लोग लापरवाह शब्द से अच्छी तरह से वाकिफ़ होंगे और थोड़ा बहुत बेपरवाह शब्द से भी । तो मैं यहाँ बेपरवाह शब्द पर ही विशेष ध्यान देना चाहूँगी।   किसी भी काम को बेपरवाही से कीजिए लेकिन लापरवाही से नहीँ। मतलब काम को करते वक्त उसके परिणाम की परवाह कम कीजिए और अपनी मेहनत,  सतर्कता से काम करने पर अर्थात लापरवाही नही करने पर लगाइए। देखिए मेहनत करना अपने हाथ में होती हैं तो उसमें लापरवाही की गुंजाईश नही रखनी चाहिए जबकि फल अर्थात परिणाम में भगवान या आप जो भी नाम देना चाहें उसका हाथ होता है तो उसकी परवाह क्यों करना। गीता का वही सिद्धान्त, कर्म करो फल की चिंता छोड़ दो।   फल की चिंता आपको अपने कर्म से भटकाती है । और जब आप परिणाम का जिम्मा भगवान पर डाल देते हैं तो वह आपकी बेपरवाही देखकर ही लापरवाही से बचा लेता है ।   अपनी मेहनत से भगवान को भी सोचने पर मजबूर कर दो की इसे नही तो किसे दूँगा, इसे तो देना ही पड़ेगा। ...

शब्दों का जादू.....

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शब्दो में जादू होता है शायद आपको ये पढ़कर थोड़ा अजीब लगे लेकिन कुछ उदाहरणों से आप बखूबी समझ जाएंगे। तो कुछ उदहारण देखिए -   -एक कपड़ो की दुकान में लिखा था "आप सीसीटीवी कैमरे की सुर...

आखिर क्यूँ मित्र हर रिश्तों से ज्यादा अहमियत रखता है

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आप में से हर किसी ने कहीं न कहीं ये लाइने पढ़ी या सुनी होगी की "दो अक्षर की "मौत" और तीन अक्षर के "जीवन" में  ढाई अक्षर का   " दोस्त " बाज़ी मार  जाता हैं.           साथ ही हर किसी की ज़िन्दगी में एक राज़दार की भूमिका अधिकतर एक दोस्त ही निभाता है और यदि ऐसा कोई नही है तो वो इंसान ऐसे दोस्त की तलाश में रहता है ।          आखिर क्यूँ हम अपनी अच्छी बुरी हर प्रकार की बातें बेझिझक दोस्त के सामने कह देते हैं । क्यूँ हर रिश्ते माँ, पिता, भाई, बहन, पति, पत्नी आदि सभी में एक दोस्त की छवि की दरकार रहती है ।           चलिये ऐसे ही कुछ सवालो के उत्तरो की चर्चा करते हैं। देखिये एक दोस्त दरअसल हर रिश्ते की परछाई होता है । वो बुरी बातों पर पिता की तरह सख्त होता है, तकलीफ़ में माँ की तरह देखभाल करता है, भाई की तरह मज़बूती से हमेशा साथ देता है तो बहन की तरह गलतियों पर सजा से बचाता भी है ।            लेकिन सबस...

‘आर्ट ऑफ़ इग्नोरिंग’

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साइंस और टेक्नोलॉजी पढ़ते-पढ़ते एक लॉजिक समझ आया, सोचा आपसे साझा कर लूँ | जोंस हॉपकिंस युनिवर्सिटी के द्वारा किये गए अध्ययन में ‘उपेक्षा की कला’ या ‘आर्ट ऑफ़ इग्नोरिंग’ के सार्थक परिणाम मिले हैं |       शोधकर्ताओं ने इसके लिए एक प्रयोग किया | दो समूह के लोगों को कंप्यूटर स्क्रीन पर विभिन्न रंगों में अक्षर दिए गए और कुछ निश्चित अक्षर (बी, एफ) तलाशने को कहा गया | एक समूह को कोई निर्देश नही दिया गया जबकि, दूसरे समूह से कहा गया की उन्हें लाल रंग के अक्षरों की उपेक्षा करनी है |       जिन व्यक्तियों (समूह) ने विचलित कर देने वाली सूचनाओं की स्पष्ट रूप से उपेक्षा की उनके द्रश्य (विसुअल) खोज प्रदर्शन में काफी सुधर देखा गया | यह कौशल रेडियोलाजिस्ट व् एयरपोर्ट बैगेज स्क्रीनर जैसे पेशेवर खोजकर्ताओं के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगा |       खैर, मैं अब मुख्य बात पर आती हूँ | मैं इस रिसर्च के आधार पर कहना चाह रही हूँ की हमें भी ज़िन्दगी में ये लॉजिक यूज़ करना चाहिए | मसलन, हम नेगेटिव बातों, उत्साह तोड़ने वाले लोगों, छोटी-छोट...

हिन्दुस्तानी हैं हम, हिन्दुस्तानी हैं..........................

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हिन्दुस्तानी हैं हम, हिन्दुस्तानी हैं..........................| ये एक पुराने विज्ञापन का थीम सोंग है शायद आप मे से कुछ को याद हो | जिसमें एस भारतीय जोड़ा तोहफे के रैपर (चमकीली पन्नी) को भी संभाल कर रखता है | मुझे तो बस इतना ही याद है और शायद यही पर्याप्त भी है |       यंहा मै यह कहना चाह रही हूँ की चीजो को पूरी तरह से उपयोग करना या कहें की बर्बाद न करना हम भारतियों की पहचान है | हालाँकि आज हमने इसे छोटे नजरिये से देखना शुरू कर दिया है |       आजकल हमारी प्रकृति कुछ एसी हो गई है की हम कोई वस्तु बिगड़ने पर उसे सुधरवाने की जगह नई लेना पसंद करते हैं | चाहे फिर वो एक साधारण सा पेन हो (जिसमे रिफिल डाली जा सकती है) या कोई इलेक्ट्रॉनिक गैजेट(मोबाइल,लैपटॉप,पंखा आदि), हम उसे सस्ते में बेचकर या कचरे में फेककर तुरंत नया ले आते हैं |       लेकिन इसमें गलती सिर्फ हमारी नही है | इसके लिए हमारी व्यस्त दिनचर्या के साथ-साथ कुछ और बातें भी जिम्मेदार हैं | पहली बात, वस्तुएं ही एसी आ रही हैं जिन्हें सिर्फ एक बार उपयोग कर...