छात्र जीवन मे हीरोपंती...

  
कभी-कभी हमें महसूस होता है कि ज़िन्दगी में सारी समस्याएं एक साथ टूट पड़ी हैं और खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। लगता है जैसे सब कुछ करते हुए भी हम कुछ नही कर पा रहे और पता नही क्यूँ इन असफलताओं के स्वयं के बोझ के साथ-साथ अपेक्षाओं का बोझ बढ़ता जा रहा है।
  तब लगता है जैसे परिवार को समझ क्यों नही आता कि उनसे ज्यादा हम पर बीतती है दिन-रात मेहनत के बाद असफल होने में भला किसे मज़ा आता होगा? क्या हम तैयारी करने वालों से ज्यादा हमे तैयारी करते देखने वाले ज्यादा थक गए हैं? तो फिर कैसे वो अपना ज्ञान झाड़ कर हमारी ज़िंदगी पर सवाल दाग गायब हो जाते हैं।
तो क्या कर सकते हैं हम ऐसी परिस्थिति में ? जवाब सवाल जितना ही जटिल है। हमे सारी चीजों को गौर से देखना चाहिए और इन सब से परे हटकर निरीक्षण करना चाहिए कि आखिर हो क्या रहा है ? किसी फिल्म जैसा नहीं लग रहा ?
  दरअसल जब आप सफलता के बहुत क़रीब होते हो तो समस्यायों की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ जाती है। एक महिला तैराक जो इंग्लिश चैनल पार कर रही थी किनारे से सिर्फ कुछ मीटर दूरी पर हार मान गई यदि वो एक बार ओर दम भर लेती तो रिकॉर्ड बनाती। इसी तरह सफलता के करीब ज़िन्दगी में फ़िल्म के क्लाइमैक्स की तरह घटनाएं घटती हैं। तो थोड़ा गौर फरमाइए और हीरो की तरह व्यवहार कीजिए।
  याद रखिए " यदि सबकुछ आपके खिलाफ जा रहा है तो सोचिये की विमान हमेशा हवा के विरुद्ध ही उड़ान भरता है।"
  इसी परिस्थिति में एक फिलोसॉफी और लागू होती है मेहनत के घड़े वाली जिसे आप अगले ब्लॉग में पढ़ सकते हैं।
 

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