कुछ कठोर सवाल...


हम आज एक समस्या पर कुछ सवाल दागेंगें लेकिन उसके लिए पहले समस्या का ज़िक्र जरूरी है। ये समस्या वो है जिसका नाम लेने में भी हमें शर्म महसूस होती है "बलात्कार"! तो, कोई ऐसा कर कैसे सकता है समझ से परे है।
  इस समस्या के लिए दोषियों से ज्यादा लड़की की लापरवाही, उसके अकेले निकलने, यहाँ तक कि उसके पहनावे हर बात को कोसना खत्म हो गया हो तो आगे बात करते हैं। 
 हम यहाँ समस्या के एक पहलू को ही उठाएंगे ताकि एक ही बात का विश्लेषण अच्छे से कर सकें। इसलिए हम समस्या के अन्य कारणों का ज़िक्र यहाँ नहीं कर रहे हैं लेकिन जो कारण यहाँ लिया जा रहा है वो भी अपने आप मे कम नहीं है, बशर्ते आप ईमानदारी से मंथन करें।
 हाँ, तो क्या कोई इंसान सच में दरिंदों की तरह व्यवहार कर सकता है ? क्या उनके दिल में ज़रा भी रहम नहीं आता ऐसा कुकृत्य करते वक्त ?
 अपने आस-पास घर में, चौराहे पर, सड़कों पर, बाज़ारों में,लोगो की अच्छी-बुरी हर तरह की नागाहों से सामना हुआ है मेरा,और यकीनन हर लड़की का हुआ होगा। 
 इनमें से बुरी निगाहों की तीव्रता में अंतर समझ आता है । लेकिन इनमें से ज्यादातर निगाहें अंधेरा होने पर ज्यादा भयावह जान पड़ती है। ऐसा क्यों ? 
 रात के अंधेरे में कुछ लोगो की निगाहें ज्यादा बुरी या नकारात्मक क्यों नज़र आने लगती है ? आखिर ऐसा क्या अलग हो जाता है ? इसके पीछे मुझे दो कारण दिखाई पड़ते हैं - पहला, "अंधेरे का भय" जिसमे अपराध करना आसान होता है, अतः लड़कियों की मानसिकता में नकरात्मकता बढ़ जाती है। दूसरा, "नशा" रात में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ जाती है।
 पहला कारण(अंधेरा) दूसरे कारण से जुड़ा हुआ है मतलब  अंधेरे में डर ज्यादातर इसलिए लगता है क्योंकी इस समय नशे की तीव्रता बढ़ जाती है। अतः, इस कारण को तभी दूर किया जा सकता है जब अंधेरे में अपराध होना कम हो जाएंगे और माहौल में सुरक्षा महसूस होने लगेगी। 
 लेकिन दूसरे कारण का क्या ? क्या नशे के ही कारण यह सब नहीं होता। क्या होशोहवास(सोफे) में व्यक्ति की इतनी हिम्मत हो जाती है कि वो दूसरे इंसान पर जुल्म करे और वो भी हैवानों की तरह। क्या इतने बर्बरतापूर्ण व्यवहार के पीछे कारण नशा नहीं है जो लोगो कि सोचने समझने की शक्ति शायद खत्म सी कर देता है। क्या नशे के कारण ही इन लोगो पर ऐसी धुन सवार हो जाती है जो इंसानियत को शर्मसार कर देती है ?
   एक अदना सा व्यक्ति भी नशे में खुदको शेर समझता है तो क्या इन दोषियों को इतनी क्रूरता करने का बल भी नशे से ही मिलता है ? इन सवालों के जवाब आपके लिए जो भी हों लेकिन मेरे अनुसार "हाँ" हैं । 
 आप मुझे इस नजरिए में कठोर कह सकते हैं।मानवाधिकारों, निजी स्वतंत्रता के तमाम सवाल मुझ पर खड़े कर सकते हैं। लेकिन किस कीमत पर आप अपने शौक, अपना मनोरंजन करना सही ठहरा सकते हैं ? क्या आपकी ये पसंद देश की आधी आबादी (महिलाओं) से बढ़कर है ? महिलाओं की सुरक्षा जरूरी है या आपके शौक ?
 सिर्फ महिलाओं के खिलाफ ही नहीं बल्कि अन्य अपराधों में भी आधे से अधिक मामलों में दोषी नशे में संलिप्त होता है। नशे में व्यक्ति हिंसक और असामान्य बर्ताव करता है। इस तरह की गम्भीर या अनचाही स्तिथि सामान्यतः सीमा से अधिक नशे के समय आती है। कहा जा सकता है कि सन्तुलित मात्रा में नशा दूसरों के लिए हानिकारक नहीं होता(स्वयं के स्वास्थ्य के लिए तो होता ही है)।
 लेकिन, लेकिन...क्या नशे की उचित सीमा आप तय कर सकते हैं ? क्या आप किसी को रोक सकते हैं असन्तुलित मात्रा में नशा करने से ? नशे की अधिकता में किए जाने जुर्म में क्या आप भागीदार बन सकते हैं ?
 क्या नशा सबसे बढ़कर है, इतना जरूरी हिस्सा है मनोरंजन का ? क्या इतनी सब समस्याओं, हिंसा सबकी कमी होने से भी ज्यादा जरूरी है ?
तो, आप अगर किसी भी तरह के या कितनी भी मात्रा में नशे के साथ है तो आपको कोई हक नहीं समस्या पर आँसू बहाने का क्योंकिं आप स्वयं कारण को छिपाकर(बचाकर) रख रहें हैं। मैं ये नही कह रही कि आप उन मुजरिमों के साथ हैं लेकिन आप पूरी तरह उनके खिलाफ भी नहीं। इस विकट समस्या(दुष्कर्म) का नायक व्यक्ति की विकृत सोच है और नशा उस नायक का अज़ीज़ मित्र। 
 आज इन्ही कुछ सवालों और मेरे एकतरफा जवाबों के साथ बात ख़त्म या कहें कि शुरू(आपके दिमाग मे) करते हैं..एक बार ईमानदारी से विचार जरूर कीजियेगा अपने आस-पास गौर जरूर कीजिएगा की नशे और अपराध की जुगलबंदी कैसी है ?समस्या नहीं समाधान पर चर्चा कीजियेगा । 
 तुम भेद सकते हो मुझे अपने शब्दों से
 तुम काट सकते हो मुझे अपनी आंखों से
 तुम मार सकते हो मुझे अपनी नफरत से
 लेकिन फिर भी हवाओं की तरह, मैं बढूँगी....

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