फिलोसॉफी झाड़ना....
फिलोसॉफी झाड़ना, शिर्षक थोड़ा ज्यादा देसी हो गया नई। दरअसल इसी शब्द से मेरी बात स्पष्ट हो पाएगी। हमारे समाज मे प्रचलन है अपनी-अपनी फिलोसॉफी(दर्शन) झाड़ने का जो एक अच्छी बात भी है। क्योंकि विचार फैलाने, चर्चा करने में भला क्या बुराई| दरअसल बुराई तब आती है जब लोग अपनी फिलोसॉफी दूसरों पर थोपने लगते हैं और अपनी फिलोसॉफी को सही व सामने वालों की फिलोसॉफी को गलत सिद्ध करने पर तुल जाते हैं।
चलिए अब मुद्दे पर आगे बढ़ते हैं। मैं खुद भी यहाँ फिलोसॉफी ही झाड़ने वाली हूँ। मुद्दे की बात यह है कि हर फिलोसॉफी का मूल उद्देश्य होता है खुशी । मतलब कोई भी फिलोसॉफी अपनाओ, आप खुश हो तो यह फिलोसॉफी आपके लिये सही; अब यह जरूरी नहीं कि ये दूसरों के लिए भी सही हो ।
मान लो आपको पसंद है आज के लिए ही जीना मतलब बचत नहीं करना और हर पल का मज़ा लेना । इस तरह जीना की कल हो न हो..जो खाना है जी भर कर खाओ, जो करना है अभी ही कर लो । उम्मीद है इतने से आप समझ गए होंगे मेरा भाव, और शायद यह भी की मेरी फिलोसोफी भी यही है। हाँ, कुछ हद तक आपका अनुमान सही भी है।
तो चलो दूसरे किस्म के लोगो की बात करते हैं वो लोग जिन्हें भविष्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में जीना पसन्द है । वे चाहते हैं भविष्य को व्यवस्थित तथा निश्चित बनाना ताकि उन्हें और उनके बच्चों को सुरक्षित भविष्य मिल सके। इस विचारधारा से मेरा सरोकार कम है शायद इसलिए ज्यादा अच्छे वाक्य नही मिल रहे लेकिन इतने से भी आप समझ तो गए ही होंगे।
तो आपको कौन पसन्द है ? ये आप पर निर्भर करता है और वो फिलहाल मुद्दा भी नही है। पहली किस्म के लोग खुश है आज जीने में उन्हें लगता है कि क्या भरोसा कब तक जीवन है ? क्या भरोसा की बच्चे अच्छे ही निकलेंगे ? तो क्यों जोड़ना पैसा और क्यों संजोना भविष्य जो पहले से ही अनिश्चित है। तो बढ़िया बात है ना भाई, अगर ऐसे जीने में ही वे खुश हैं तो क्यों उन्हें एक अनिश्चित भविष्य की परवाह में घुट-घुट कर जीने पर विवश किया जाए।
इसी तरह, दूसरी किस्म के लोगो को यदि संजोने(चीजें या पैसा ) में ही खुशी मिलती है तो इस बात से क्या मतलब की यह संजोना काम आएगा या नही। मतलब ऐसा समझ लीजिए कि उनकी ही हॉबी कलेक्शन है।
अतः, किसी को स्वेटर पहन-पहन कर फाड़ देने में खुशी है तो किसी को उसे सहेज कर रखने में। आप दोनों तरह की खुशियों की तुलना नहीं कर सकते और न ही किसी को कमतर मान सकते हो। वैसे ही जैसे किसी को चॉक्लेट फ्लेवर पसन्द है किसी को वनीला लेकिन कोई कमतर नही है।
हाँ, ये जरूर है कि आप उन्हें दूसरे पक्ष के बारे में बता सकते हैं और इस प्रकार वे शायद ऊपर की दोनों फिलोसोफी का मिश्रण अपना लें।
तो, आपका अंतिम उद्देश्य खुश रहना होना चाहिए चाहे कोई भी फिलोसोफी आप चुनें या कोई नही चुने या सभी तरह की फिलोसोफी को मिलाकर खिचड़ी जैसी । फिलोसोफी के सही या गलत होने का फैसला कोई दूसरा या सामने वाला नही कर सकता ये तो आपकी खुशी पर निर्भर करता है।
तो बेशक फिलोसोफी झाड़ो ताकि किसी को पसंद आने पर वह आंशिक या पूर्ण रूप से उसे अपना ले लेकिन कृपया फिलोसोफी किसी पर लादो मत। जैसे सभी व्यक्ति यूनिक हैं, सभी भिन्न हैं उसी तरह उनकी फिलोसोफी भी यूनिक है, भिन्न है।
चलिए अब मुद्दे पर आगे बढ़ते हैं। मैं खुद भी यहाँ फिलोसॉफी ही झाड़ने वाली हूँ। मुद्दे की बात यह है कि हर फिलोसॉफी का मूल उद्देश्य होता है खुशी । मतलब कोई भी फिलोसॉफी अपनाओ, आप खुश हो तो यह फिलोसॉफी आपके लिये सही; अब यह जरूरी नहीं कि ये दूसरों के लिए भी सही हो ।
मान लो आपको पसंद है आज के लिए ही जीना मतलब बचत नहीं करना और हर पल का मज़ा लेना । इस तरह जीना की कल हो न हो..जो खाना है जी भर कर खाओ, जो करना है अभी ही कर लो । उम्मीद है इतने से आप समझ गए होंगे मेरा भाव, और शायद यह भी की मेरी फिलोसोफी भी यही है। हाँ, कुछ हद तक आपका अनुमान सही भी है।
तो चलो दूसरे किस्म के लोगो की बात करते हैं वो लोग जिन्हें भविष्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में जीना पसन्द है । वे चाहते हैं भविष्य को व्यवस्थित तथा निश्चित बनाना ताकि उन्हें और उनके बच्चों को सुरक्षित भविष्य मिल सके। इस विचारधारा से मेरा सरोकार कम है शायद इसलिए ज्यादा अच्छे वाक्य नही मिल रहे लेकिन इतने से भी आप समझ तो गए ही होंगे।
तो आपको कौन पसन्द है ? ये आप पर निर्भर करता है और वो फिलहाल मुद्दा भी नही है। पहली किस्म के लोग खुश है आज जीने में उन्हें लगता है कि क्या भरोसा कब तक जीवन है ? क्या भरोसा की बच्चे अच्छे ही निकलेंगे ? तो क्यों जोड़ना पैसा और क्यों संजोना भविष्य जो पहले से ही अनिश्चित है। तो बढ़िया बात है ना भाई, अगर ऐसे जीने में ही वे खुश हैं तो क्यों उन्हें एक अनिश्चित भविष्य की परवाह में घुट-घुट कर जीने पर विवश किया जाए।
इसी तरह, दूसरी किस्म के लोगो को यदि संजोने(चीजें या पैसा ) में ही खुशी मिलती है तो इस बात से क्या मतलब की यह संजोना काम आएगा या नही। मतलब ऐसा समझ लीजिए कि उनकी ही हॉबी कलेक्शन है।
अतः, किसी को स्वेटर पहन-पहन कर फाड़ देने में खुशी है तो किसी को उसे सहेज कर रखने में। आप दोनों तरह की खुशियों की तुलना नहीं कर सकते और न ही किसी को कमतर मान सकते हो। वैसे ही जैसे किसी को चॉक्लेट फ्लेवर पसन्द है किसी को वनीला लेकिन कोई कमतर नही है।
हाँ, ये जरूर है कि आप उन्हें दूसरे पक्ष के बारे में बता सकते हैं और इस प्रकार वे शायद ऊपर की दोनों फिलोसोफी का मिश्रण अपना लें।
तो, आपका अंतिम उद्देश्य खुश रहना होना चाहिए चाहे कोई भी फिलोसोफी आप चुनें या कोई नही चुने या सभी तरह की फिलोसोफी को मिलाकर खिचड़ी जैसी । फिलोसोफी के सही या गलत होने का फैसला कोई दूसरा या सामने वाला नही कर सकता ये तो आपकी खुशी पर निर्भर करता है।
तो बेशक फिलोसोफी झाड़ो ताकि किसी को पसंद आने पर वह आंशिक या पूर्ण रूप से उसे अपना ले लेकिन कृपया फिलोसोफी किसी पर लादो मत। जैसे सभी व्यक्ति यूनिक हैं, सभी भिन्न हैं उसी तरह उनकी फिलोसोफी भी यूनिक है, भिन्न है।
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