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बड़े लोग - बड़े लोग

शीर्षक "खिचड़ी" सीरियल के बच्चों के डायलॉग जैसा लग रहा है ना "बड़े लोग-बड़े लोग"। अरे, अरे चिंता नहीं कीजिये आपको नहीं भी पता इस(खिचड़ी सीरियल) बारे में, तब भी आज का मुद्दा आपके समझ आ जायेगा। तो आप किन्हें बड़े लोग मानते हैं ? 'बड़े लोग' से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो विभिन्न मापदण्डो जैसे अनुभव, धन, ज्ञान आदि में बड़े हों | यहाँ बड़े होने का उम्र से कोई सरोकार नहीं है। तो आपमें से कई लोगों के लिए सचिन तेंदुलकर, सलमान खान, मुकेश अंबानी इस तरह के लोग बड़े लोगों की सूची में शीर्ष पर होगें। जो अपने-अपने क्षेत्रों में दिग्गज है और वाकई हैं भी, पर यदि आप वास्तव में इनसे रूबरू हुए हों तो हो सकता है आपका नजरिया इनके प्रति कुछ बदल जाए। हो सकता है आप उन्हें और अधिक पसंद करने लगे और ये भी हो सकता है कि कम पसंद करने लगें । (मैं स्पष्ट करना चाहूंगी कि उपरोक्त नामों पर मैं किसी भी तरह का कोई इल्ज़ाम नहीं लगा रही, ना ही कोई सवाल उठा रहीं हूँ।) पर चलिए हम व्यवहारिक या सामान्य परिवेश की बात करते हैं। आपके आस-पास मौजूद लोगों में से आप किन्हें 'बड़े लोग' या ...

क्या कभी आप "Booster" बने हैं ?

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हाँ, तो क्या आप कभी बूस्टर बने हैं ? नहीं तो फिर अब बन जाइए। आपके आस पास नजर दौड़ाइये क्या कुछ लोग ऐसे नजर आते हैं। जिन्हें देखकर आपको महसूस हो "वाकई ये अच्छा काम कर रहे हैं" हो सकता है आप भी इन लोगो में से हों। और हो सकता है आप ये भी जानते हो कि कुछ अच्छा करने के लिए व्यक्ति को हमेशा अपने दायरे को बढ़ाना पड़ता है। कोई अच्छा काम कम्फर्ट जोन को तोड़कर ही किया जा सकता है जो अतिरिक्त ऊर्जा या एक्स्ट्रा एफर्ट मांगता है। तो बात ये है कि कई बार अच्छा कार्य करने वाले व्यक्ति के पास इस अतिरिक्त ऊर्जा की कुछ कमी हो जाती है क्योंकि आखिर वो भी एक इंसान है। इस कमी की पूर्ति कईबार बहुत छोरी-छोटी बातों या प्रोत्साहन से की जा सकती है। जैसे झुग्गी झोपड़ी के बच्चों को पढ़ाने जाने वाली एक रिटायर्ड शिक्षिका' जब अतिरिक्त शारीरिक श्रम के कारण इस अच्छे कार्य को करने के लिए निरुत्साहित हो गई तभी एक घटना ने उन्हें फिर से प्रेरित किया । हुआ ये था कि झुग्गी झोपड़ी बच्चा खेलते समय पास के नाले में गिर गया और भीग गया जब उसे शिक्षिका द्वारा नहाकर कपड़े बदलने के लिए कहा गया तो उसका जवाब था मेरे ...

उपेक्षा

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कोरोना या कोविड-19, कितने समय से जानते हैं इस बीमारी के बारे में ? यही कोई 2 साल...और इतने कम समय में इसके इलाज के लिए कई सारे उपाय खोज लिए गए हैं जिसमे सबसे प्रभावी वैक्सीन को माना जा रहा है । कुछ लोग इस पर सवाल उठा सकते हैं कि अभी तक इसका कोई अचूक समाधान नहीं है पर फिर भी कुछ न कुछ है तो सही ना, कोई आपसे ये तो नहीं कह रहा ना कि ये तो होगा ही, आपके पास इसे सहने के अलावा कोई चारा नहीं। जब इतने कम समय में इस समस्या के लिए कुछ किया जा सकता है तो उस समस्या के लिए क्यों नहीं जिससे आधी दुनिया कहीं न कहीं परेशान है। और तो और ये समस्या कोई साल दो साल से नहीं बल्कि मानव के उत्पत्ति के साथ कि ही मानी जा सकती है। अब भी शायद नहीं समझे होंगे तो चलो मै बताती हूँ, वो है माहवारी। अब आप कहेंगे ये तो कोई समस्या नहीं है। तो, आपकी अधूरी जानकारी को विस्तार दीजिये और इस समस्या के प्रति सवेंदनशील बनिए। बेशक सभी महिलाओं को माहवारी के समय परेशानी नहीं होती पर कइयों को होती है और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। माहवारी के दौरान महिलाओं को हार्मोन्स परिवर्तन के कारण जो मानसिक त्रास(मूड ऑफ) होता है उसे छोड़ भ...

Process of Healing / "राहत की प्रक्रिया"

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हर इंसान राहत चाहता है कोई दर्द से तो कोई तकलीफों से। ये दर्द और तकलीफ मानसिक भी हो सकती है, शारिरिक भी । तो आज हम इन सबसे राहत की जो प्रक्रिया होती है उसकी चर्चा करेंगे । ये बस एक चर्चा होगी कोई उपाय नहीं या निष्कर्ष नहीं। हालांकि हो सकता है चर्चा के दौरान हम किसी उपाय तक पहुँच जाए। देखा जाए तो ये बस मेरे अनुभवों और निरिक्षणों को साझा करने की भाँति है। तो चलिए शुरू करते हैं, अगर हम किसी शारिरिक पीड़ा की बात करें जैसे मान लिजिए आप दिनभर शारिरिक श्रम या वर्जिश के चलते थक गए हैं या ये थकान कई दिनों कि है। तो क्या होता है जब आप विश्राम की अवस्था में जाते हैं मतलब रात को या किसी भी समय जब आप लेटते हैं तब कुछ समय बाद आपको क्या महसूस होता है? यकीनन आपका दर्द बढ़ जाता है आपके शरीर के वे सभी अंग जो थक गए थे अब पहले से ज्यादा दर्द करने लगते हैं कई बार ये दर्द इतना बढ़ जाता है कि आप सो भी नहीं पाते। तो ये सब क्या हो रहा है ?आपको लगता है, इससे अच्छा तो आराम ही नहीं करना चाहिए था ।जबकि आराम तो एक राहत की प्रक्रिया है आपको शरीर की थकावट दूर करने का जरिया | पर इस प्रक्रिया ने आपका दर्द बढ़ा दिय...

रिलेक्स मोड

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कभी-कभी व्यक्ति को कुछ समय के लिए रिलेक्स मोड में चले जाना चाहिए इस दौरान ज़िन्दगी को कुछ धीमी गति से जीना चाहिए...अपनी पसंद की चीजें करना अपने मन की सुनना और ज़िन्दगी की चूहा दौड़ से अलग होकर कुछ ऐसे पल बिताना जो आपको अहसास कराएं की हाँ, मै खुश हूँ अब भी इस समय भी, मेरे आस पास सब कुछ वाकई कितना अच्छा है । पढ़ाई या काम के बोझ को थोड़ा किनारे कर ज़िन्दगी के अन्य पहलुओं पर नज़र डालने वाला समय जो कहीं न कहीं आपको प्रेरित भी करता है क्योंकि कई बार ऐसा भी होता है कि मेहनत और असफलता के बाद हम हताश हो जाते हैं और सोचते हैं कि मैने इसे पाने के लिए क्या नहीं किया, हर पल इसके प्रति समर्पित रहा, हर समय अनुशासन का जीवन जीया, कभी समय बर्बाद(तथाकथित) नहीं किया, पढ़ने या काम के अलावा कभी किसी चीज पर ध्यान नहीं दिया, पर देखो, तब भी मुझे असफलता मिली। ये मायूसी आपको हताश कर देती है, आपके विचारों की नकारात्मक बना देती है आपको स्वयं पर एक तरह से तरस या दया आती है कि इसके लिए सारी इच्छाओं का दमन किया और उसका क्या सिला मिला। तो, जब आप इन सब(कार्यप्रणाली) के बीच थोड़ा समय अपने लिए निकालेंगे तो आपको ...

कुछ पंक्तियाँ

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समुद्र सी विशाल बन जिसका कोई किनारा नहीं, जिसका कोई सहारा नहीं कोई नदी मिले न मिले, अपना वजूद कायम तब भी रख किसी बारिश पर निर्भर नहीं रह, स्वयं को विस्तार दे कोई नहीं हो तब भी अपनी मस्ती में मगन रहना सीख सबके साथ खिल खिला लेकिन, साथ का इंतज़ार न कर तू चल, बस चलती जा, मंज़िल जरूर आएगी ये राहे भी कहाँ बुरी है, बस इनके मोह में न पड़ बहुत दूर जाना है तुझे, अपने आप को संभाल अपनी कमजोरियों से डटकर लड़, इनमें समय ज़ाया न कर तू अकेली नहीं है बहुत से सपने,बहुत सी उम्मीदें संग है तेरे याद रख तेरा मकसद, ये जीवन, ये समय इन व्यर्थ की बातों में न उलझा आगे बढ़, आगे बढ़ समुद्र सी विशाल बन

ज़िन्दगी के उसूल

हर व्यक्ति के कुछ मूल्य होते हैं कुछ उसूल होते हैं जिनके आधार पर वह जीवन जीता है। ये साधारण सी बात है और अच्छी भी पर क्या होता है जब आप अपने उसूलों के आधार पर दूसरों को आँकना(जज करना) शुरू करते हैं, वो भी लोगो के बाह्य स्वरूप या उनकी कुछ आदतों के आधार पर। ये कहाँ तक सही है ? सही गलत के फैसले के लिए मैं अपने कुछ अनुभव साझा करना चाहूँगी। मै और मेरी दोस्त पढ़ने के लिए एक बड़े शहर में गए और हम छोटे शहर के मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं। हम वहाँ जिस जगह रहते थे उसमें आठ से दस लड़कियाँ थीं । सभी काफी अलग थीं हमें वहाँ शुरू में काफी अजीब लगता था उन लड़कियों का पहनावा उनके द्वारा फ़ोन पर लड़कों से बात करना और हम तो हतप्रभ रह गए जब उन्होंने हमसे पूछा तुम्हारा bf है ? ये सवाल जैसे हम पर वज्र की तरह गिरा, ऐसा लगा जैसे किसी ने हमारा अपमान कर दिया हो । आखिर वो हमें ऐसा कैसे समझ सकतें हैं ? "ऐसा" क्या मतलब है इस शब्द का क्या सोचते थे हम उन लड़कियों के बारे में, कभी तो ये गाना गाते थे हम अपनी स्थिति पर की "ये कहाँ आ गए हम.." मतलब साफ था अपने पैमाने , अपनी सोच के आ...

इच्छाएँ और आत्म नियंत्रण

  कहते हैं इच्छाएँ व्यक्ति को गुलाम बना देती है तथा इच्छाएँ ही मनुष्य के दुःख का कारण भी हैं। वहीं, आत्म नियंत्रण व्यक्ति को गंभीर, विवेकशील और सन्तुलित बनाता है।   मेरे अनुसार ये दोनों ही एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं। इच्छाओं की अनुपस्थिति व्यक्ति को अकर्मण्य और आलसी बना देगी तथा जीवन काफी नीरस हो जाएगा वहीं आत्म नियंत्रण की अधिकता व्यक्ति को जोखिम उठाने से रोकेगी साथ ही उसे लचीला(डायनामिक) की बजाए कट्टर(रिजिड)  बना देगी।  अतः, दोनों में समन्वय व सन्तुलन आवश्यक है इच्छाएँ यदि आत्म नियंत्रण के साथ कि जाए तो व्यक्ति अधिक खुशहाल जीवन जी सकता है।   आप इसे किसी गाड़ी के इंजन और ब्रेक के समान समझ सकते हैं जीवन की गाड़ी में इच्छाएँ इंजन है, तो आत्म नियंत्रण ब्रेक। ब्रेक की मौजूदगी ही गाड़ी के इंजन को रफ्तार पकड़ने का आत्मविश्वास दे सकती है और इसी प्रकार इंजन के बिना ब्रेक का कोई अर्थ नहीं ।  इसलिए व्यक्ति को जीवन मे इन दोनों में उचित सन्तुलन बनाना चाहिए। कहते हैं जहां चाह वहाँ राह इसलिए चाह करना पहली सीढ़ी है। इसमें आत्म नियंत्रण उस चाहत को पाने के मार्ग में भटकाव...

रात के बाद ही तो सवेरा होता है🌞

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 सुबह....सुबह शब्द अपने आप में ही कितनी संभावनाएं, कितनी ऊर्जा, कितनी सकारात्मकता समेटे है। सुबह हम जब हम गुड मॉर्निंग विश करते हैं कैसा भी मूड हो अच्छा महसूस होता है एक नई आशा मिलती है।  ये नई आशा की किरण हमे हर मुसीबत में धैर्यवान रखती है, एक आवाज़ आती हो जैसे अंदर से "सब ठीक हो जाएगा" और ठीक हो भी जाता है, और कभी नहीं भी होता तो हम उसे ठीक मानने लगते है मतलब अपनाने लगते हैं स्वीकार करने लगते हैं। इस तरह ये एक दिलासे की तरह है जो हमे प्रकृति से मिलता है।  प्रकृति से मिलता है अतः यह हमेशा मौजूद होगा और अपरिहार्य रूप से सत्य भी होगा। इस तरह यह अपरिहार्य सत्य है कि हर शाम के बाद सुबह आएगी ही और वो सुबह हमे बाह्य के साथ-साथ आंतरिक ऊर्जा और प्रकाश देगी।   इसलिए जब आप बहुत मुश्किल में हों कोई रास्ता नहीं नज़र आ रहा हो कोई शब्द या कोई वाक्य ऐसा न हो जो आपको उम्मीद दे सके याद रखिए हर रात की सुबह होती है कुछ मत कीजिये बस इंतज़ार कीजिए।  विश्वास रखिए कि " दिल नाउम्मीद नहीं नाकाम ही तो है,  लम्बी है गम की शाम, लेकिन शाम ही तो है"  मतलब सुबह जरूर ह...

पूर्वानुमान के जोखिम

   पूर्वानुमान कितना सरल से शब्द है ना लेकिन कितनी कठिनाइयाँ पैदा कर देता है। यकीनन आप भी अपनी ज़िंदगी मे बहुत से पूर्वानुमान लगते होगें कई बार ये किसी घटना के बारे में होते हैं और कई बार किसी व्यक्ति के बारे में। हम यहाँ व्यक्तियों के बारे में लगाये जाने वाले पूर्वानुमान या अंदाजे की बात करेंगे। किसी व्यक्ति को देखते ही हम उसके बारे में पूर्वानुमान लगाना शुरू कर देते हैं कि व्यक्ति कैसा होगा,क्या करता होगा आदि। हमारा ये पूर्वानुमान हमारे अनुभवों और जानकारियों पर आधारित होता है। एक तरह से ये हमे अपने आस पास के लोगो को समझने उन्हें त्वरित प्रतिक्रिया देने में मदद करता है । कई लोग तो इसमें विशेषज्ञ होते हैं और अपने पूर्वानुमान की सटीकता की गारंटी भी ले लेते हैं। लेकिन पूर्वानुमान हमेशा खरे नहीं उतरते कई बार हमें विपरीत परिणाम भी मिलते हैं। यद्यपि सन्तुलित रूप से अगर पूर्वानुमान लगाया जाए, जो लचीला भी हो तो वह अच्छा होता है जैसे, आपने किसी लड़के को देखकर अंदाज़ा लगाया कि वह नौसिखिया है जबकि आप जब उसका काम देखते हैं तो उसकी दक्षता से प्रभावित हो जाते हैं यहां आपने पूर्वानुमान तो लगाय...

शहीद....योद्धा...वीर...रंगों के पीछे का स्याह पक्ष ?

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शहीद, योद्धा, वीर इस तरह के शब्द सुनते ही किसकी छवि आती है आपके मन में ? शहीद भगतसिंह, योद्धा  झांसी की रानी, वीर शिवाजी...इसी तरह के नाम आपके ज़हन में आते होंगे। बेशक आने भी चाहिए क्योंकि ये हस्तियाँ अपने जज़्बे, अपने काम से स्वयं को अमर कर गई।   यहाँ बात किसी पर सवाल उठाने की नहीं है। बात सिर्फ एक उपेक्षित मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने की है। ज़ाहिर तौर पर बहुत लोगो की भावनाएं उपरोक्त नामों से जुड़ी है और बता दूं कि उनमें मैं भी शामिल हूँ। इन सभी का बिना किसी शर्त सम्मान करते हुए मैं अपनी बात रखना चाहूँगी।  दरअसल मसला यह है कि इतिहास पढ़ते हुए एक विचार दिमाग में कौंधा। फ़लाँ राजा की बेटी का विवाह सन्धि के तहत किसी राजा से कर दिया गया, राज्य जीतने पर पराजित राजा की रानियाँ अधीन कर ली गईं, सौदे या समझौते में महिलाओं को वस्तु की तरह लिया गया। क्या ये सब बातें आपको सोचने पर मजबूर नहीं करती ?   किसी राज्य की सुरक्षा या भलाई हेतु एक राजकुमारी या किसी भी महिला को सौंप दिया जाता है किन्ही भी हाथों में, यहाँ सवाल संबंधित राजा की मजबूरी या राष्ट्र की भलाई या व्यवहारिक रास...

जो दिखता है वो बिकता है.....सही है ?

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शीर्षक के शब्दों पर नहीं भाव पर जाइए क्योंकी यहाँ ये बात इंसानों के परिप्रेक्ष्य में कही जा रही है।  आज की दुनिया डिजिटल होती जा रही है साथ ही उपभोक्तावादी भी। जहां हम चीजों को उसके बाहरी आवरण से आंकते हैं और उसी के अनुसार उसे अपनाते हैं। हालांकि, बाद में हमारे विचार उस वस्तु के प्रति बदल भी सकती है।    ईमानदारी से सोचे तो हम व्यक्तियों के साथ भी क्या इसी तरह का तरीका नहीं अपनाते ? अधिकांश लोग ऐसा ही करते हैं और जो शेष हैं वो भले रूप के आधार पर किसी के साथ बुरा व्यवहार न करें लेकिन कई बार रूप से प्रभावित होकर व्यवहार जरूर करते होंगे।   कुछ लोग अपवाद के रूप में बेशक मौज़ूद हैं जो दोनों वर्गों में नहीं आते। खैर हम यहां सामान्य लोगों की बात कर रहे हैं। तो फिर से मुद्दे पर आते हैं, क्या ये बाहरी दिखावा हमे कई बार सच्चाई से दूर नहीं ले जाता ? क्या इसके कारण कुछ लोगों की प्रतिभा या गुण छिपे नहीं रह जाते ? क्या कुछ लोगों के साथ रूप के आधार पर जाने-अनजाने किए गए व्यवहार से अन्याय नहीं होता ?   आजकल के दौर में विभिन्न तकनीकों ओर उत्पाद...

दिल ये ज़िद्दी है....

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  " ज़िद्दी " कितना नकारात्मक शब्द माना जाता है ना। बचपन से हम सुनते आए हैं कि ज़िद मत करो, ज़िद्दी होना बुरी बात है। एक तरह से ये बात सही है कि लेकिन वाक्य अधूरा है सही वाक्य यह होगा कि " बेवजह की ज़िद बुरी बात है।" मतलब हर ज़िद बुरी नहीं होती।  "ज़िद करो दुनिया बदलो" यह वाक्य याद होगा तो शायद आपको मेरे कहने का तात्पर्य जल्दी समझ आएगा। खैर न भी याद हो तो कोई बात नहीं।     आपको ज़िद को समझना होगा ज़िद आखिर होती क्या है ? अपनी मांग को लेकर दृढ़ रहना ही तो ज़िद है।  जब तक मांग पूरी नहीं हो जाए बात पर अड़े रहना, चाहे कुछ हो जाए, चाहिए मतलब चाहिए ही, इस तरह की भावना ही ज़िद है। जिसमें हम कह सकते हैं कि मांग की पूर्ति के अलावा कोई रास्ता नही होता कोई चीज़ बीच मे नहीं आ सकती कोई समझौता नहीं हो सकता।     तो क्या हो अगर आप इस तरह की ज़िद किसी अच्छी आदत या अच्छी बात के लिए करें और खुद से इस तरह की ज़िद करें। मसलन, आपकी ज़िद हो स्वास्थ्य को लेकर कसरत करने की, किसी नई भाषा (जैसे अंग्रेज़ी) सीखने की, इसी तरह किसी लक्ष्य की प्राप्ति को लेकर आपकी ज़िद हो ।  ...

कुछ कठोर सवाल...

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हम आज एक समस्या पर कुछ सवाल दागेंगें लेकिन उसके लिए पहले समस्या का ज़िक्र जरूरी है। ये समस्या वो है जिसका नाम लेने में भी हमें शर्म महसूस होती है "बलात्कार"! तो, कोई ऐसा कर कैसे सकता है समझ से परे है।   इस समस्या के लिए दोषियों से ज्यादा लड़की की लापरवाही, उसके अकेले निकलने, यहाँ तक कि उसके पहनावे हर बात को कोसना खत्म हो गया हो तो आगे बात करते हैं।   हम यहाँ समस्या के एक पहलू को ही उठाएंगे ताकि एक ही बात का विश्लेषण अच्छे से कर सकें। इसलिए हम समस्या के अन्य कारणों का ज़िक्र यहाँ नहीं कर रहे हैं लेकिन जो कारण यहाँ लिया जा रहा है वो भी अपने आप मे कम नहीं है, बशर्ते आप ईमानदारी से मंथन करें।  हाँ, तो क्या कोई इंसान सच में दरिंदों की तरह व्यवहार कर सकता है ? क्या उनके दिल में ज़रा भी रहम नहीं आता ऐसा कुकृत्य करते वक्त ?  अपने आस-पास घर में, चौराहे पर, सड़कों पर, बाज़ारों में,लोगो की अच्छी-बुरी हर तरह की नागाहों से सामना हुआ है मेरा,और यकीनन हर लड़की का हुआ होगा।   इनमें से बुरी निगाहों की तीव्रता में अंतर समझ आता है । लेकिन इनमें से ज्यादा...

आप कब खुश होते हैं ?

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आपसे कोई पूछे कि आप क्या देखकर या क्या पाकर खुश होगें या की क्या चीज आपको खुश कर सकती है ? आपका जवाब क्या होगा नौकरी, शादी, पैसा, घर आदि-आदि शायद अधिकांश का जवाब कुछ इसी तरह का होगा। अब वो मिलने के बाद भी आप खुश होतें हैं या नही,आज मुद्दा वो नहीं है।   दरअसल आज मुद्दा है कि आप इतना इंतज़ार क्यों करेंगे खुश होने का, मतलब ज़ाहिर है कि ये सारी चीजें प्राप्त करने में समय लगता है तो तब तक क्या ? मेरा तात्पर्य यह है कि आप अपने आस पास की बहुत सी छोटी-छोटी चीजों से भी खुश हो सकते हैं और फिर खुशी-खुशी कीजियेगा कोशिश अपनी अपेक्षाकृत बड़ी खुशियां पाने का। अपनी पसंद की चीजों की सूची बनाइए और कोशिश कीजिये इस सूची में शामिल चीजें जितनी हो सके उतनी छोटी व आसान हो। अपनी पसंद की चीजें शामिल करने का मकसद है कि उनसे आपके चेहरे पर मुस्कान आती है या आपको खुशी मिलती है। वैसे ही जैसे मान लो आपको गुलाब पसन्द हों और कोई आपके लिए गुलाब का बुके ले आये आपकी प्रतिक्रिया कैसी होगी ? दिल खुश और नतीज़तन एक प्यारी सी मुस्कान जो वास्तविक(नेचुरल) होगी । ये सूची बनाने से होगा यह कि आपको समझ आएगा कि ऐसी बहु...

अनसुलझी पहेली और आदर्शवादी जवाब..

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शीर्षक की तरह ही है आज का मुद्दा कुछ अनसुलझा सा। क्या आप लोगो के दिमाग मे कभी ये ख़याल आया है कि हमारे आस पास के कुछ लोग ऐसे क्यूँ हैं ? ऐसे मतलब जो इंसानियत से पहले किसी और चीज़ को तवज्जो देते हैं जैसे धन, ओहदा आदि।    इन लोगो की समझदारी पर आश्चर्य होता है कि कैसे - कैसे तरीकों को अपनाते हैं ये लोग अपने फायदे के लिए। लेकिन मुझे समझ नही आता कि ये आखिरकार इनके लिए फायदेमंद होता भी है या नहीं।   ये लोग तात्कालिक फायदे को ही हमेशा नज़र में कैसे रख सकते हैं। क्या गलत तरीके से कमाया गया पैसा या फायदा उनकी आने वाली पीढ़ी को आरामपसंद औऱ कामचोर बनाने की राह पर नहीं ले जाता। वो क्या उसूल पेश करते होंगे अपने बच्चों के आगे, क्या ये ही बच्चे भविष्य में पैसे के आगे अपने बूढ़े माता पिता को तवज्जो देंगें।   मेरा ख़याल है अपने जीवन मे हमे कम से कम कुछ अच्छे कर्म तो करने ही चाहिए जिनकी मिसालें आने वाली पीढ़ियों को दी जा सके। अपने बच्चों के लिए कुछ अच्छे और सच्चे किस्से सहेजिये।   साथ ही कुछ लोग इन तथाकथित समझदारों से बिल्कुल उलट होते हैं जिन्हें नफा- नुकसान ज्यादा समझ नही...

अपनी भूमिका खुद चुनें

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  आज शुरुआत एक कहानी से करते हैं या कहें कि आज सिर्फ कहानी...।   एक व्यक्ति जंगल से गुज़रता है तभी उसे एक लोमड़ी दिखाई देती है जो पूरी तरह अपाहिज और लाचार नज़र आती है। वह सोचता है की ये लोमड़ी जीवित कैसे होगी ? वो वहीं रुक कर देखता है। कुछ समय बाद वो देखता हैं कि एक शेर अपने शिकार से साथ आता है और शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के लिए छोड़कर चला जाता है। वह आश्चर्यचकित रह जाता है कि शेर लोमड़ी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाता साथ ही उसे भोजन भी उपलब्ध कराता है। इसके बाद वह जंगल में ही रहने का मन बना लेता है और सोचता है कि भगवान जैसे इस लोमड़ी के लिए भोजन का इंतज़ाम करतें हैं उसी प्रकार मेरे लिए भी करेंगें। मेरे जीवन की व्यवस्था भगवान जरूर करेंगें।   इसके बाद वो इंतज़ार करता रहता है और दिन बीतते जातें हैं। दो दिन तक कोई नहीं आता अब वो एकदम कमज़ोर हो जाता है फिर भी सोचता है भगवान अवश्य कुछ करेंगे। अगले दिन एक संत जंगल से गुजरते हैं और उस व्यक्ति पर उनकी नज़र पड़ती है। संत उसके पास जाकर उससे सब माज़रा पूछते हैं। संत मुस्कुराते हैं और कहतें हैं कि भगवान ने तुम्हे ग्राही नहीं दाता की भूम...

अच्छाई पर भरोसा और उसकी कद्र...आप करतें है ?

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वैसे आपका जवाब क्या है ? "हाँ ", ज़रा ठीक से सोचिए यकीनन "हाँ " । अच्छा चलिए आपकी बात मान लेते हैं, वैसे आज यही(मानना) विषय भी है जो आप आगे समझ जाएंगे।        क्या आपने कभी महसूस किया है कि ये व्यक्ति(मतलब सामने वाला व्यक्ति) अच्छे होने का अभिनय कर रहा है, या शायद इसका मन्तव्य कुछ और है भले ही वो मंतव्य आपके समझ न आ रहा हो। मेरा ख़याल है कभी-न-कभी आपको जरूर ऐसा महसूस हुआ होगा। ऐसा दरअसल होता क्यों है ? क्योंकि हम कई बार ऐसे मीठे बोलने वाले लोगों के झांसे में आकर धोका खाये हुए होतें हैं या इस तरह के किस्सों से वाकिफ़ होते हैं जिनमे विलन मीठी छुरी की तरह होते हैं।   तो, ये बातें हम कर क्यों रहे हैं ? क्या आपको नहीं लगता कि आपकी इस तरह की मानसिकता( ऊपर वर्णित) अच्छाई से भरोसा उठता हुआ दर्शा रही है। इससे सिध्द होता है कि कहीं-न-कहीं आप ये मानते हैं कि कोई इतना अच्छा कैसे हो सकता है ? इसकी निःस्वार्थ मदद के पीछे भी शायद कोई स्वार्थ छिपा है।           मेरा ये कहना है कि हो सकता है कि कुछ लोग वाकई में ...

मेहनत का घड़ा

  देखिये इसकी भूमिका में पिछले ब्लॉग में दे चुकी हूँ, तो उसे भी ध्यान में रखिएगा। आपकी ज़िंदगी मे कितनी समस्याएँ हैं ना परिवार, नौकरी, रिश्ते, असफलताएं आदि आदि अनिश्चितता से ...

छात्र जीवन मे हीरोपंती...

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   कभी-कभी हमें महसूस होता है कि ज़िन्दगी में सारी समस्याएं एक साथ टूट पड़ी हैं और खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। लगता है जैसे सब कुछ करते हुए भी हम कुछ नही कर पा रहे और पता नही क्यूँ इन असफलताओं के स्वयं के बोझ के साथ-साथ अपेक्षाओं का बोझ बढ़ता जा रहा है।   तब लगता है जैसे परिवार को समझ क्यों नही आता कि उनसे ज्यादा हम पर बीतती है दिन-रात मेहनत के बाद असफल होने में भला किसे मज़ा आता होगा? क्या हम तैयारी करने वालों से ज्यादा हमे तैयारी करते देखने वाले ज्यादा थक गए हैं? तो फिर कैसे वो अपना ज्ञान झाड़ कर हमारी ज़िंदगी पर सवाल दाग गायब हो जाते हैं। तो क्या कर सकते हैं हम ऐसी परिस्थिति में ? जवाब सवाल जितना ही जटिल है। हमे सारी चीजों को गौर से देखना चाहिए और इन सब से परे हटकर निरीक्षण करना चाहिए कि आखिर हो क्या रहा है ? किसी फिल्म जैसा नहीं लग रहा ?   दरअसल जब आप सफलता के बहुत क़रीब होते हो तो समस्यायों की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ जाती है। एक महिला तैराक जो इंग्लिश चैनल पार कर रही थी किनारे से सिर्फ कुछ मीटर दूरी पर हार मान गई यदि वो एक बार ओर दम भर लेती तो रिकॉर्ड ...