इच्छाएँ और आत्म नियंत्रण

 

कहते हैं इच्छाएँ व्यक्ति को गुलाम बना देती है तथा इच्छाएँ ही मनुष्य के दुःख का कारण भी हैं। वहीं, आत्म नियंत्रण व्यक्ति को गंभीर, विवेकशील और सन्तुलित बनाता है।

  मेरे अनुसार ये दोनों ही एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं। इच्छाओं की अनुपस्थिति व्यक्ति को अकर्मण्य और आलसी बना देगी तथा जीवन काफी नीरस हो जाएगा वहीं आत्म नियंत्रण की अधिकता व्यक्ति को जोखिम उठाने से रोकेगी साथ ही उसे लचीला(डायनामिक) की बजाए कट्टर(रिजिड)  बना देगी।

 अतः, दोनों में समन्वय व सन्तुलन आवश्यक है इच्छाएँ यदि आत्म नियंत्रण के साथ कि जाए तो व्यक्ति अधिक खुशहाल जीवन जी सकता है। 

 आप इसे किसी गाड़ी के इंजन और ब्रेक के समान समझ सकते हैं जीवन की गाड़ी में इच्छाएँ इंजन है, तो आत्म नियंत्रण ब्रेक। ब्रेक की मौजूदगी ही गाड़ी के इंजन को रफ्तार पकड़ने का आत्मविश्वास दे सकती है और इसी प्रकार इंजन के बिना ब्रेक का कोई अर्थ नहीं ।

 इसलिए व्यक्ति को जीवन मे इन दोनों में उचित सन्तुलन बनाना चाहिए। कहते हैं जहां चाह वहाँ राह इसलिए चाह करना पहली सीढ़ी है। इसमें आत्म नियंत्रण उस चाहत को पाने के मार्ग में भटकाव को तो रोकेगा ही साथ ही अवांछित चाहतों पर भी लगाम लगाएगा।

 

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