अच्छाई पर भरोसा और उसकी कद्र...आप करतें है ?



वैसे आपका जवाब क्या है ? "हाँ ", ज़रा ठीक से सोचिए यकीनन "हाँ " । अच्छा चलिए आपकी बात मान लेते हैं, वैसे आज यही(मानना) विषय भी है जो आप आगे समझ जाएंगे।
       क्या आपने कभी महसूस किया है कि ये व्यक्ति(मतलब सामने वाला व्यक्ति) अच्छे होने का अभिनय कर रहा है, या शायद इसका मन्तव्य कुछ और है भले ही वो मंतव्य आपके समझ न आ रहा हो। मेरा ख़याल है कभी-न-कभी आपको जरूर ऐसा महसूस हुआ होगा।
ऐसा दरअसल होता क्यों है ? क्योंकि हम कई बार ऐसे मीठे बोलने वाले लोगों के झांसे में आकर धोका खाये हुए होतें हैं या इस तरह के किस्सों से वाकिफ़ होते हैं जिनमे विलन मीठी छुरी की तरह होते हैं।
  तो, ये बातें हम कर क्यों रहे हैं ? क्या आपको नहीं लगता कि आपकी इस तरह की मानसिकता( ऊपर वर्णित) अच्छाई से भरोसा उठता हुआ दर्शा रही है। इससे सिध्द होता है कि कहीं-न-कहीं आप ये मानते हैं कि कोई इतना अच्छा कैसे हो सकता है ? इसकी निःस्वार्थ मदद के पीछे भी शायद कोई स्वार्थ छिपा है। 
         मेरा ये कहना है कि हो सकता है कि कुछ लोग वाकई में मीठी छुरी होतें हैं लेकिन क्या इसकी सज़ा हम बाकियों को भी देंगे जो वास्तव में अच्छे हैं और कोई अभिनय नहीं कर रहे।
  इस तरह के अविश्वास से क्या उनके अच्छे दिल को ठेस नही पहुंचती होगी और तो और क्या आपको एक अच्छे इंसान को खोने का नुकसान नहीं होता होगा।
  ये दुनिया भरोसे पर चलती है आप एक छोटे से दुकानदार को जहाँ सीसीटीवी नहीं लगा है पहले रुपये दो फिर समान लो या पहले समान लो फिर रुपये दो, ये भरोसा दोनों को रखना पड़ता है कि दुकानदर पैसे लेकर मुकरेगा नहीं और ग्राहक समान लेकर भागेगा नहीं।
  तो हम इस तरह से अच्छाई पर भरोसा कायम क्यों नहीं रखते, हो सकता है कि हमे कुछ नुकसान हो लेकिन क्या दुनिया में अच्छाई बनाए रखने की हम इतनी कीमत नहीं चुका सकते। यकीन रखिये "हर कुछ, सब कुछ से जुड़ा होता है" आपकी अच्छाई किसी-न-किसी रूप में आप तक लौटकर आएगी। तो, स्वयं भी अच्छे और सच्चे बनिये और दूसरों के इन गुणों पर भी भरोसा रखिए, बड़े-बड़े न सही छोटे कामों में ही सही क्यूंकि "अच्छा होना अंततः अच्छा ही होता है।।
 

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