कुछ तो लोग कहेंगे....


आज के जमाने में फटी जीन्स स्टाइल स्टेटमेंट है लेकिन कुछ सालों पहले ऐसा करने पर लोग कितनी बातें बनाते थे। वैसे आप कहेंगे कि बनाने वाले आज भी बाते बना ही लेते हैं और आप सही भी कह रहे हैं लेकिन मुख्य बात यह है कि क्या आज उनकी बातें बनाने का जीन्स पहनने वाले पर फर्क पड़ता है ?

  बेशक नहीं बल्कि फटी जीन्स पहनकर उनका स्वैगर और बढ़ जाता है। मतलब आजकल का फैशन या आजकल की पीढ़ी "बेफिक्रे" है। ज्यादा मत सोचिए, मैने ये फ़िल्म(बेफिक्रे) नहीं देखी है तो यहाँ संदर्भ अलग है।
  तो आज के इस अचानक शुरू होने वाले ब्लॉग के इंट्रो से आपको क्या समझ आया..? ये बताता है कि सही लिहाज़ में बेफिक्रे बनने में कोई बुराई नही है।

मतलब आपको लोगो या उनकी बातों की बजाए अपने हिसाब से काम करना चाहिए । इससे फायदा यह होगा कि आप कम से कम एक इंसान को तो खुश रख पाएंगे और वो ख़ुद आप है, इसी के साथ आपकी खुशी से आपके अपने भी खुश होंगे। वह काम भी अच्छे से होगा फलतः लोग भी कहीं न कहीं खुश होंगे।

और अगर आप लोगो को खुश करने जाओगे तो वो असम्भव किस्म की बात है जिसमे आपको अपना मन मारना पड़ेगा मतलब आप खुश नहीं, और बिना खुशी के कोई काम पूरी तरह से अच्छे से नहीं हो सकता इस तरह लोग भी खुश नहीं।

तो उम्मीद है आपको समझ आ गया होगा कि फायदा किसमे है ? वैसे मैं साफ़ कर दूँ की यहाँ लोगों की बातों में न आने से मतलब यह नही की आप सबकी सुनना ही बंद कर दें और अपनी मनमानी ही चलाते जाएँ। बात 'सिर्फ' लोगो के अनुसार चलने या उनकी बातों से हतोत्साहित होने की है जिससे आप मन लगाकर कुछ काम नही कर पाते।

आपको वही करना चाहिए जो करने का आपका मन गवाही दे। अगर आप बेमन से सिर्फ किसी के कहने से कुछ काम करेंगे तो असफलता की संभावना ज्यादा है साथ ही आप मन मे कहेंगे कि इसका जिम्मेदार मैं नहीं जबकि वास्तव में जिम्मेदार आप भी हैं कि आपने बेमन से काम किया। क्योंकि," या आरंभ ही न करो। यदि कर दिया है तो, उसे पूर्ण करके ही उठो। यही श्रेष्ठता का लक्षण है।"

तो, अपनी ज़िंदगी की गाड़ी में दूसरों को स्टेयरिंग मत पकडाइये यह अंततः सबके लिए अच्छा होगा। और न करे नारायण आपसे दुर्घटना हो भी जाती है तो आप इसी तरह से तो कुशल ड्रायवर बनेंगे। जिम्मेदार बनिए अपने निर्णयों के प्रति, याद रखिए " ज़िन्दगी अपने दम पर जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो जनाजे उठते हैं"

मुझे उम्मीद है शीर्षक से ही आप सभी को मेरा भाव समझ आ गया होगा कि इशारा किस और है तो, कुछ पंक्तियों से बात खत्म करना चाहूँगी की
"आप जो करना चाहते हैं वह कीजिए। लोग तो तब भी कुछ कहते हैं, जब आप कुछ नहीं करते।" - ओशो

Comments

  1. सत्य और केवल सत्य, इसलिये सदैव उन्हीं कार्यों पर अपनी ऊर्जा व्यय कीजिये जो कि आत्मसंतुष्टि प्रदान करते हों।

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