बूँद-बूँद से दुनिया के महासागर न सही एक घड़ा तो भरिये !!!


आप लोगो को कुछ नही करना तो मत कीजिये लेकिन जो कुछ कर रहें हैं कम-से-कम उन्हें तो मत टोकिये |
            मैं सुन-सुनकर थक चुकी हूँ की “ इससे कुछ फर्क नही पढ़ने वाला है ” | देखो कुछ समझ नही आया न | दरअसल बात ये है की छोटी-छोटी आदतें जैसे फ़िज़ूल बिजली खर्च न करना, छोटे-मोटे कामो में पानी बचाना, पैदल जाना या सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करना, पेपर कम बर्बाद करना, आदि को अपनाने वाले लोगो को अधिकांशतः कंजूस कहा जाता है या उनका मखौल उडाया जाता है | कहतें हैं की तुम्हारे अकेले के यह सब करने से कुछ फर्क नही पढने वाला अकेला चना भाड नही फोड़ सकता |
            इस सन्दर्भ में आपको एक छोटी-सी कहानी सुनाना चाहूंगी | एक महिला समुद्र किनारे खड़ी थी जिसे पास खडा एक किशोर काफी देर से देख रहा था | वह महिला किनारे पर पानी के बाहर आकर मर रही मछलियों को वापस समुद्र मैं फेंककर बचाने की कोशिश कर रही थी | किशोर ने आखिर महिला से पुछ ही लिया ऐसा करने से क्या होगा? इतनी सारी मछलियों के आगे केवल कुछ को बचाना कुछ मायने नही रखता | तब महिला बोली इस एक मछली के लिए यह बहुत मायने रखता है जिसे मैं बचा सकती हूँ |
            मतलब अगर मैं प्रकृति के लिए थोडा-सा भी योगदान दें रही हूँ तो धीरे-धीरे कुछ तो बदलाव लायेगा | और अगर ऐसा प्रत्यक्ष रूप से मेरे सामने नही होता तो भी मुझे संतुष्टि तो रहेगी की मैं पर्यावरण नही बचा पाई लेकिन मैंने उसे कम-से-कम नुकसान पहुँचाया | एक- एक वोट की कीमत नेता समझ सकता है तो मुझे नही लगता की हम उनसे भी गए-गुजरे हैं | 

              

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