किसान vs. PM

             


नही नही यंहा शीर्षक का अर्थ किसान vs. प्राइममिनिस्टर नही बल्कि मैं तो यहाँ किसानो तथा pm अर्थात् particulate matter की बात करने जा रही हूँ | अगर हम pm को आम भाषा में समझना चाहें तो यह हवा में प्रदुषण के छोटे-छोटे कण है | यह प्रदूषित वातावरण का स्तर जानने में कम में आता है |

              आज शाम के वक्त जब मैं अपने आँगन में गई तो मुझे सभी ओर काले-काले टुकडे दिखाई दिए लगभग सभी पाठक इनसे रूबरू हए ही होंगे ओर जानते होंगे की यह खेतो के जलाने से उड़े कण है | आज दिल्ली समेत देश के कई बढे शहर प्रदुषण (pm) की समस्या से जूझ रहे है जिसमे ये कण समस्या को अधिक बाढा देते हैं |
             
             खेतो में गेंहू की फसल काटने के बाद जो पौधो के तने (ठूंठ) शेष रहते है (इन्हें नरवाई भी कहते हैं) उन्हें अक्सर जला कर साफ़ किया जाता है |

              लेकिन इतना शोर-शराबा होने के बाद भी किसान मानते क्यों नही ? क्यों वे खेतों में आग लगा कर ही नरवाई से निजात पाना चाहते हैं ?

              सुना है की इनसे तो खेत हंकवाकर अर्थात् हल चलवाकर भी इनसे आसानी से छुटकारा पाया जाता है |

              फिर क्यों नही सुनते हमारे किसान भाई | तो जरा ध्यान देने की कोशिश कीजिये की खेत में खड़े उन नरवाइयों का आकार क्या है ? आज के मशीनीकरण के चलते फसल काटने के बाद बचे इन खान्पो (नरवार्ईयों) ऊंचाई या कहें की लम्बाई इतनी अधिक बढ़ गई है की हल चलाने भर से इनसे मुक्ति नही मिलती | फलस्वरूप अशिकांश किसानो को मजबूरन आग का सहारा लेना पढ़ता है |

              पुराने समय में जब मशीनें अधिक प्रचलन में नही थी तब फसल हाथों से काटी जाती थी तो यह खांपें (नरवाइयाँ) भी छोटे-छोटे होते थे जिन्हें गुढ़ाई द्वारा या हल चलाकर आसानी से दूर किया जा सकता था और साथ ही  जो कुछ खेत जलाये भी जाते थे तो उनसे कम प्रदूषित माहौल के कारण इतना फर्क नही पढ़ता था |

              तो हमें सिर्फ समस्या का उपरी हल न तलाश कर थोड़ी गहराई में जाने की जरुरत है | नरवाई जलाने पर प्रतिबन्ध लगाने और किसानो पर सीधे आरोप मढने से पहले उनकी दिक्कतों के हल खोजने होंगे चाहे वो उन्नत किस्म की मशीनों द्वारा संभव हो या किसी और तरीके से |  

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