वो दिन भी क्या दिन थे.....
बचपन में जब हम ऐसा करते थे कितना मज़ा आता था ना, यार कॉलेज में तो सच में हमने बहुत मज़े किए, यार पता है जब में वहाँ रहती थी ना हम लोग ऐसे ऐसे काम करते थे कि पूछो मत और ब्ला-ब्ला-ब्ला। कुछ समझ आया ? जब भी किसी की यादों का पिटारा खुलता है उसमें अक्सर अच्छी खुशनुमा बातें होती हैं। हां, कभी-कभी कुछ संघर्ष के दिन भी याद आ जाते हैं। लेकिन कमोबेश पुरानी यादें आपको वर्तमान पलों से है हसीन ही लगती है। पुरानी अच्छी यादों को संजोए रखना तो अच्छी बात है लेकिन पुराने से तुलना करने के चक्कर में वर्तमान पलो को कमतर समझना, समझदारी तो नहीं कही जा सकती। इसलिए कंपेयर करना छोड़ो और जो पल जियो जी भर कर जियो,खुल कर जियो। और कुछ नहीं तो, यही लॉजिक लगा लो कि फिर अच्छी यादें भी तो जमा करना है ताकि आगे आने वाले समय में आप उन्हें सुना सके।